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ग़ज़ल
न अहल-ए-दिल से न अहल-ए-नज़र से मिलता है
शुऊर-ए-ज़ात फ़क़त अपने दर से मिलता है
प्रकाश नाथ प्रवेज़
ग़ज़ल
ख़ुशी से फूलें न अहल-ए-सहरा अभी कहाँ से बहार आई
अभी तो पहुँचा है आबलों तक मिरा मज़ाक़-ए-बरहना-पाई
फ़ारूक़ बाँसपारी
ग़ज़ल
भुला देना न अहल-ए-दिल को तुम जश्न-ए-बहाराँ में
कि उन का ख़ून भी शामिल है ता'मीर-ए-गुलिस्ताँ में
सिराजुद्दीन सिराज
ग़ज़ल
ग़म से ना-अहल-ए-वफ़ा हश्र तक आज़ाद न हो
मर के सौ बार हो ज़िंदा तो कभी शाद न हो