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ग़ज़ल
कोई लौ तक न दी काले पेड़ों को इस आतिशीं रक़्स ने
या'नी जंगल में उस मोर का नाचना भी अकारत गया
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
बस्तियों से दूर जाना ख़्वाहिशों को पार कर
जंगलों में नाचना गुमनाम हो जाने के बाद
प्रणव मिश्र तेजस
ग़ज़ल
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छेड़ूँ
या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
टूट गया जब दिल तो फिर ये साँस का नग़्मा क्या मा'नी
गूँज रही है क्यूँ शहनाई जब कोई बारात नहीं