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ग़ज़ल
घबराई क्यूँ बैठी है अब ग़म-ख़्वारों के नर्ग़े में
ले आई है महफ़िल में जब तू अपनी तन्हाई को
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
हमेशा ख़ौफ़ के नर्ग़े में रहता हूँ मगर फिर भी
अबाबीलों की मिंक़ारों में लश्कर देख लेता हूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
जब कुछ मासूमों की जाँ थी हैवानों के नर्ग़े में
तब हर सूरत हो सकती थी हर ख़तरा इम्कानी था
शहपर रसूल
ग़ज़ल
जब से मुझ को हासिल है तेरे क़ुर्ब की दौलत
नक़्श-ए-संग-ए-पाइंदा मुझ पे आइना सा है