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ग़ज़ल
सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नट-खट दिन
दबे दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दो-पहरें
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट
दिल लें हैं यूँ कि हरगिज़ होती नहीं है आहट
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
बेकल उत्साही
ग़ज़ल
इंसानों के कर्तब देख के 'राहिब' पास के जंगल में
नीम के पेड़ की शाख़ पे बैठा नटखट बंदर चौंक पड़ा
इमरान राहिब
ग़ज़ल
कौन बढ़ाए प्यार की पेंगें उस नट-खट बंजारन से
फिरने को तो नगरी नगरी फिरती है हरजाई धूप
नो बहार साबिर
ग़ज़ल
उन का तसव्वुर झूटे वा'दे याद का साया दिल की बस्ती
एक सपेरा नट-खट बच्चे बड़ के पेड़ तले मेले में
बिमल कृष्ण अश्क
ग़ज़ल
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
तुझे देता है बाज़ी ऐ 'मुहिब' बच जाइयो उस से
कि नट-खट उस के यार और वो दग़ाबाज़ एक घूना है