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ग़ज़ल
दुनिया के नेक-ओ-बद से काम हम को 'नियाज़' कुछ नहीं
आप से जो गुज़र गया फिर उसे क्या जो हो सो हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
ग़ज़ल
हवस होगी असीर-ए-हल्क़ा-ए-नेक-ओ-बद-ए-आलम
मोहब्बत मावरा-ए-फ़िक्र-ए-नंग-ओ-नाम है साक़ी
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
मूसा की है क़सम तुझे और कोह-ए-तूर की
नूर-ओ-फ़रोग़-ए-जल्वा-ए-लमआ'न की क़सम
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
रौशन-ज़मीर हैं ये तिरे ख़ाकसार-ए-इश्क़
रखते हैं फ़ैज़-ए-इश्क़ से नूर-ओ-सफ़ा-ए-क़ल्ब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
इन्हीं आँखों से तू ने नेक-ओ-बद आलम का देखा है
इधर तो देख ऐ सारी ख़ुदाई देखने वाले
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
सिखा देता है इक़बाल आदमी को नेक-ओ-बद आख़िर
ये दौलत है वो शय शान-ए-रियासत आ ही जाती है
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
हिसाब-ए-नेक-ओ-बाद जो भी हो हम इतना समझते हैं
बिना-ए-हश्र दर्द-ए-दिल पे चश्म-ए-तर पे रक्खी है
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
आलम दिखा रहे हैं अजब नूर-ओ-नार का
जल्वों को हुस्न-ओ-इश्क़ के यक-जाँ किए हुए