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ग़ज़ल
निगाह-ए-लुत्फ़ मत उठ ख़ूगर-ए-आलाम रहने दे
हमें नाकाम रहना है हमें नाकाम रहने दे
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
निगाह-ए-लुत्फ़ कभी गर वो मस्त-ए-नाज़ करे
नियाज़-मंद को आलम से बे-नियाज़ करे
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
ग़ज़ल
हम पर निगाह-ए-लुत्फ़ कभी है कभी नहीं
तुम ही कहो ये क्या है अगर दिल लगी नहीं
पंडित विद्या रतन आसी
ग़ज़ल
हम पर निगाह-ए-लुत्फ़ कभी है कभी नहीं
तुम ही कहो ये क्या है मगर दिल-लगी नहीं
पंडित विद्या रतन आसी
ग़ज़ल
निगाह-ए-लुत्फ़ से तेरी कहीं जो हम मिलते
हमारी ज़ीस्त के शाम-ओ-सहर बहम मिलते