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ग़ज़ल
अम्बर भी नीला नीला है दरिया भी नीला नीला
उन दोनों ने ज़हर पिया हो ऐसा भी हो सकता है
सय्यद सरोश आसिफ़
ग़ज़ल
बैठे हैं सुनहरी कश्ती में और सामने नीला पानी है
वो हँसती आँखें पूछती हैं ये कितना गहरा पानी है
सलीम अहमद
ग़ज़ल
सूरज है गो ना-मेहरबाँ है सर पे नीला साएबाँ
ऐ आसमाँ ऐ आसमाँ दाइम रहे साया तिरा
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
भेड़ें उजली झाग के जैसी सब्ज़ा एक समुंदर सा
दूर खड़ा वो पर्बत नीला ख़्वाब में खोया लगता है