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ग़ज़ल
इक उम्र चाहिए कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़
रक्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कहाँ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ
नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हिज्र की शब को अगर काटे तो फिर है रोज़-ए-वस्ल
नीश के पर्दे में देखा नोश भी मस्तूर है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
क्यूँ न वहशत में चुभे हर मू ब-शक्ल-ए-नीश-तेज़
ख़ार-ए-ग़म की तेरे दीवाने की काविश और है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
पड़ चुके बहुत पाले डस चुके बहुत काले
मूज़ियों के मूज़ी को फ़िक्र-ए-नीश-ए-अक़रब क्या
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
इश्क़ में गेसू ओ अबरू के अगर देनी है जान
नीश-ए-अक़रब खा के पी ले ज़हर थोड़ा साँप का
रिन्द लखनवी
ग़ज़ल
इश्क़ किस ज़ात का अक़रब है कि लगते ही नीश
दिल के साथ आँखों से पानी हो बहा क्या क्या कुछ
मोहम्मद रफ़ी सौदा
ग़ज़ल
रौंदें तो ये कलियाँ नीश-ए-बला चूमें तो ये शोले फूल
ये ग़म ये किसी की देन भी है इनआम अजब इनआम
मजीद अमजद
ग़ज़ल
जिन की जीभ के कुंडल में था नीश-ए-अक़रब का पैवंद
लिक्खा है उन बद-सुखनों की क़ौम पे अज़दर बरसे थे
मजीद अमजद
ग़ज़ल
कीना कुछ शर्त नहीं उन की दिल-आज़ारी को
नीश-ए-अक़रब हैं तिरी शोख़ सितम कर पलकें