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ग़ज़ल
अगरचे इश्क़ में आफ़त है और बला भी है
निरा बुरा नहीं ये शग़्ल कुछ भला भी है
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
दिल में भर कर सोज़ ये इश्क़-ओ-वहशत की बीमारी का
जिस्म दिया है तू ने मुझ को एक निरा संसारी का
विश्वदीप ज़ीस्त
ग़ज़ल
गिरफ़्तारी की लज़्ज़त और निरा आज़ाद क्या जाने
ख़ुशी से काटना ग़म का दिल-ए-नाशाद क्या जाने
इश्क़ औरंगाबादी
ग़ज़ल
शमीम अब्बास
ग़ज़ल
ज़रूरत है वतन को तेरे ईसार-ए-मुकम्मल की
अगर जज़्बा तिरा ख़ालिस निरा हिन्दोस्तानी है
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
बिगाड़ पैदा हुआ है मु'आशरे में निरा
सफ़ों में आगे खड़े हैं 'अजीब बौने से