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ग़ज़ल
सितम के रंग हैं हर इल्तिफ़ात-ए-पिन्हाँ में
करम-नुमा हैं तिरे जौर सर-ब-सर फिर भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को
ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ख़ुश-नुमा या बद-नुमा हो दहर की हर चीज़ में
'जोश' की तख़्ईल कहती है कि नुदरत देखिए
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है
ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता