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ग़ज़ल
फ़रहत की सूरत नीं नज़र आई मुझे ऐ नूर-ए-चश्म
तेरी जुदाई में मगर 'आलम को महज़ूनी दिया
उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला
ग़ज़ल
गुज़र जब जब हुआ है 'नूर' बाज़ार-ए-मोहब्बत से
बचा कर अपनी आँखें हम हर इक ख़ातून से निकले
शहनवाज़ नूर
ग़ज़ल
ख़ा ली शिकस्त फ़त्ह-ए-मुबीं के यक़ीन से
हाँ 'नूर' अब के हिम्मत-ए-मर्दां लिए हुए
नूर मोहम्मद नूर
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़-ओ-ज़ुल्फ़ जो तूल-ए-शब-ए-हिज्राँ बन जाए
चश्म वो चश्म जो पैकान-ए-जिगर होती है
नूर मोहम्मद नूर
ग़ज़ल
बाब-ए-शहर-ए-इरफ़ाँ के नूर-ए-चश्म का है फ़ैज़
परचम-ए-जहूल-ए-वक़्त जो झुका झुका सा है