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ग़ज़ल
हम उन की तरफ़ से कभी होते नहीं ग़ाफ़िल
रिश्ते वही पक्के हैं जो पक्के नहीं होते
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
तो ये नोटों की ख़ुश्बू कौन सी पॉकेट से आई है
मैं कैसे मान लूँ बंद-ए-क़बा में कुछ नहीं रक्खा