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ग़ज़ल
वो तिरी गली के तेवर, वो नज़र नज़र पे पहरे
वो मिरा किसी बहाने तुझे देखते गुज़रना
पीर नसीरुद्दीन शाह नसीर
ग़ज़ल
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था
जौन एलिया
ग़ज़ल
ख़ुदा की तरह शायद क़ैद हैं अपनी सदाक़त में
अब अपने गिर्द अफ़्सानों के पहरे कर लिए हम ने
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
अब कूचा-ए-दिल-बर का रह-रौ रहज़न भी बने तो बात बने
पहरे से अदू टलते ही नहीं और रात बराबर जाती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव
आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
लगे हैं शम्अ पर पहरे ज़माने की निगाहों के
जिन्हें जलने की हसरत है वो परवाने कहाँ जाएँ
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम
पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है पर्वाज़ के साथ
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
ये क्या घुटन है मोहब्बत की पहरे-दारी में
वो काग़ज़ों पे खुली खिड़कियाँ बनाता है