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ग़ज़ल
छुपाया हुस्न को अपने कलीम-उल्लाह से जिस ने
वही नाज़-आफ़रीं है जल्वा-पैरा नाज़नीनों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर
डुबोया ज़िंदगी को दास्ताँ-दर-दास्ताँ हम ने
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
क्या न चाहा कि बना ले मह-ए-कनआँ को ग़ुलाम
एक बुढ़िया ने भी अफ़्सोस कि पैसा न हुआ
रशीद कौसर फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
किस तरह चश्मों सेती जारी न हो दरिया-ए-ख़ूँ
थल न पैरा 'आबरू' हम वार और वे पार हैं
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
अमल-पैरा वही हैं ख़ुश-ख़ोर-ओ-ख़ुश-ज़ी पे सख़्ती से
ज़बाँ पे जिन की फ़ाक़ा-कश का हर दम नाम है साक़ी
मानी नागपुरी
ग़ज़ल
फ़ज़ल हुसैन साबिर
ग़ज़ल
तह-ए-आब-ए-दिल-ओ-जाँ मोतियों की तरह रहते हैं
जो मंज़र इस जहान-ए-ख़ाक में पैदा हुए ख़ुद से