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ग़ज़ल
शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से
पर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बज़्म-ए-याराँ हो कि मय नग़्मा के फ़ैज़ान-ए-सुख़न
सब हैं साज़िश में शरीक उस की मिरे दिल के ख़िलाफ़
वहीद अख़्तर
ग़ज़ल
तुम्ही पे क्या कि हम अब ख़ुद पे भी नहीं खुलते
तो क्या ये कम है कि हम पर खुला फ़साना-ए-इश्क़
आबिद वदूद
ग़ज़ल
राह-गुम-कर्दा हैं क़दमों के निशाँ होते हुए
बे-घरी का दर्द सहते हैं मकाँ होते हुए
इम्तियाज़ नदीम
ग़ज़ल
वो रह-ओ-रस्म न वो रब्त-ए-निहाँ बाक़ी है
फिर भी इस दिल को मोहब्बत का गुमाँ बाक़ी है
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
अदू-ए-बद-गुमाँ की दास्ताँ कुछ और कहती है
मगर तेरी निगाह-ए-ख़ुश-बयाँ कुछ और कहती है
साहिर होशियारपुरी
ग़ज़ल
जीते जी ख़ुद से मोहब्बत में गुज़रना है मुझे
सूरत-ए-मौजा-ए-रवाँ मिट के उभरना है मुझे