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ग़ज़ल
कौन देता है मोहब्बत को परस्तिश का मक़ाम
तुम ये इंसाफ़ से सोचो तो दुआ दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
नाज़ परस्तिश बन जाएगा सब्र ज़रा ऐ शोरिश-ए-दिल
उल्फ़त की दीवाना-गरी से हुस्न अभी बेगाना है
अंदलीब शादानी
ग़ज़ल
जल्वा-ए-हुस्न-ए-परस्तिश गर्मी-ए-हुस्न-ए-नियाज़
वर्ना कुछ काबे में रक्खा है न बुत-ख़ाने में है
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
बुत-परस्ती जिस से होवे हक़-परस्ती ऐ 'ज़फ़र'
क्या कहूँ तुझ से कि वो तर्ज़-ए-परस्तिश और है