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ग़ज़ल
नख़्ल-ए-ममनूअा के रुख़ दोबारा गया मैं तो मारा गया
अर्श से फ़र्श पर क्यूँ उतारा गया मैं तो मारा गया
फ़रताश सय्यद
ग़ज़ल
ज़माने की दो-रंगी से उमंगें मिट गईं सारी
कभी था नाज़ हम को भी 'फ़रोग़' अपनी तबीअ'त पर
फ़रोग़ हैदराबादी
ग़ज़ल
ग़ज़ल वो क्यूँ न हो 'फ़ारिग़' दुर-ए-अदन कि जहाँ
हर एक शे'र को ज़िद हो कि शाह-पारा बनूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
ग़ज़ल
फ़राग़ रोहवी
ग़ज़ल
क्या इफ़शा न राज़-ए-ग़म किसी पर जीते-जी 'फ़ारिग़'
बड़े सब्र-ओ-तहम्मुल से बसर की ज़िंदगी मैं ने
लक्ष्मी नारायण फ़ारिग़
ग़ज़ल
किताबें फेंक के ग़ुर्बत ने अपने हाथों से
ये लिख लिया है बदन पर बदन बराए-फ़रोख़्त
लकी फ़ारुक़ी हसरत
ग़ज़ल
फ़ानूस ने फ़रोग़ दिया शम-ए-हुस्न को
पर्दे से बढ़ गई रुख़-ए-अनवर की बात और
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
ग़ज़ल
है सज्दा-ए-इख़्लास का अदना सा करिश्मा
मैं फ़र्श-ए-ज़मीं पर हूँ तो सर अर्श-ए-बरीं पर