जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

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    जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं

    आसमाँ पर दिमाग़ रखते हैं

    साक़ी भर भर उन्हीं को दे है शराब

    जो कि लबरेज़ अयाग़ रखते हैं

    तेरे दाग़ों की दौलत गुल-रू

    हम भी सीने में बाग़ रखते हैं

    हाजत-ए-शम्अ क्या है तुर्बत पर

    हम कि दिल सा चराग़ रखते हैं

    आप को हम ने खो दिया है 'बयाँ'

    आह किस का सुराग़ रखते हैं

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    फ़सीह अकमल

    फ़सीह अकमल

    फ़सीह अकमल

    जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं फ़सीह अकमल

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