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ग़ज़ल
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
नहीं तर्जुमान-ए-बयाँ कोई जो है पर्दा-दार-ए-सुकूत है
हैं ये दाग़ दाग़ इबारतें बड़े एहतिमाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हालत-ए-क़ल्ब सर-ए-बज़्म बताऊँ क्यूँकर
पर्दा-ए-दिल में है इक पर्दा-नशीं का लालच
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
बे-पर्दा आज निकलेगा पर्दा-नशीं मिरा
कर दे ये कोई महर-ए-मुनव्वर को इत्तिलाअ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हवा में जब उड़ा पर्दा तो इक बिजली सी कौंदी थी
ख़ुदा जाने तुम्हारा परतव-ए-रुख़्सार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मैं तो हूँ परवर्दा-ए-आग़ोश-ए-तूफ़ान-ए-फ़ना
ख़ुद डुबो देता हूँ कश्ती क़ुर्ब साहिल देख कर
नख़्शब जार्चवि
ग़ज़ल
या दर्द के नग़्मों में वही है तिरी आवाज़
या पर्दा-ए-साज़-ए-रग-ए-जाँ और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
आगही से हैं हक़ीक़त की वो आँखें महरूम
जिन पे हो पर्दा-ए-औहाम-ओ-फ़ुसून-ए-जज़्बात
मुदस्सिर हुसैन मुदस्सिर
ग़ज़ल
मैं बे-ज़बान नहीं हूँ ब-पास-ए-हुरमत-ए-हर्फ़
गड़ा हुआ कोई ख़ंजर मिरी ज़बान में है