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ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
तब से आशिक़ हैं हम ऐ तिफ़्ल-ए-परी-वश तेरे
जब से मकतब में तू कहता था अलिफ़ बे ते से
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
हर परी-वश को ख़ुदा तस्लीम कर लेता हूँ मैं
कितना सौदाई हूँ क्या तस्लीम कर लेता हूँ मैं