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ग़ज़ल
क्या क्या हसीं थे जम्अ' परिस्ताँ का तख़्ता था
नज़रों में फिरते हैं रुख़-ए-ज़ेबा-ए-लखनऊ
वाजिद अली शाह अख़्तर
ग़ज़ल
शोहरा-ए-आफ़ाक़ मुझ सा कौन सा दीवाना है
हिन्द में मैं हूँ परिस्ताँ में मिरा अफ़्साना है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
जो देखते हैं दिन में हिक़ारत की नज़र से
'मेहर' उन के लिए शब में परिस्तान हैं सड़कें
मेहर ज़र्रीं
ग़ज़ल
क़ाबिल-ए-ग़ौर है ऐ जल्वा-परिस्तान-ए-अज़ल
ये कहानी है मिरी वाक़िया-ए-तूर नहीं
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
नारी हैं जो परियाँ ये सबब है कि तुम्हारे
नूर-ए-रुख़-ए-रौशन से परिस्ताँ में लगी आग
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
ग़ज़ल
चलते हो परिस्ताँ में परियाँ हैं बहुत शाएक़
अब हुस्न-ए-परी-ख़ाना फिर आज से अफ़्ज़ूँ है
वाजिद अली शाह अख़्तर
ग़ज़ल
इक परिस्तान में ठहराया है उस इश्क़ ने और
दूसरे शख़्स को मुल्तान में रक्खा हुआ है