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ग़ज़ल
जंग-जूई क्या कहूँ उस की कि कल-परसों में आह
सुल्ह टुक होने न पाई थी कि झगड़ा पड़ गया
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
नईम नाज़
ग़ज़ल
जो पागल औरत परसों तक इक गुड़िया नोचा करती थी
कल उस की झिलमिल चुनरी में एक मटियाला गुड्डा सा था
बिमल कृष्ण अश्क
ग़ज़ल
परसों मैं बाज़ार गया था दर्पन लेने की ख़ातिर
क्या बोलूँ दूकान पे ही मैं शर्म के मारे गड़ बैठा
नवीन सी. चतुर्वेदी
ग़ज़ल
फड़कता आज भी हम को न परसों की तरह रखिए
ख़ुदा के वास्ते कुछ याद वो अगली क़सम कीजे
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी