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ग़ज़ल
तीर की परवाज़ है मश्कीज़ा-ए-दिल की तरफ़
हो के घायल फिर भी हम माइल हैं क़ातिल की तरफ़
काविश बद्री
ग़ज़ल
चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है
सुर्मा तो कहवे कि दूद-ए-शो'ला-ए-आवाज़ है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शम्अ जले है महफ़िल महफ़िल ख़ाक-बसर परवाना है
इस दुनिया में दर्द पराया सच है किस ने जाना है
बद्र शम्सी
ग़ज़ल
क्यों आँख मुज़्तरिब है जो दिल पाक-बाज़ है
शायद मिज़ाज-ए-इश्क़ में ख़ू-ए-मजाज़ है
नख़्शब जार्चवि
ग़ज़ल
इस क़दर मुश्ताक़ परवाना हुआ था सुब्ह का
शम' की लौ से फ़साना सुन रहा था सुब्ह का
शहज़ाद अंजुम बुरहानी
ग़ज़ल
ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए
मैं मुसाफ़िर हूँ मुझे रख़्त-ए-सफ़र भी चाहिए
भारत भूषण पन्त
ग़ज़ल
कौन सी वो शम्अ' थी जिस का मैं परवाना हुआ
और फिर लौ भी लगी ऐसी कि दीवाना हुआ
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
ठीक है 'पर्वाज़' हम को मिल न पाईं मंज़िलें
छोड़ दें उम्मीद का मैदान ऐसा कुछ नहीं