आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "pas-e-pusht"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "pas-e-pusht"
ग़ज़ल
है क़हक़हों के पस-ए-पुश्त गिर्या-ए-पैहम
मिरी ख़ुशी भी मुझे ग़म दिखाई देने लगी
मेहदी बाक़र ख़ान मेराज
ग़ज़ल
हम ने देखा है भरे शहर में साया अपना
एक सूरज है पस-ए-पुश्त पराया अपना
सय्यदा कौसर मनव्वर शरक़पुरी
ग़ज़ल
मुँह पर तो मुआफ़िक़ है पस-ए-पुश्त मुख़ालिफ़
दुश्मन जो मिरा है वो सगा है भी नहीं भी
आरज़ू अशरफ़ सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
जंग की मुख़्तलिफ़ साज़िशों में पस-ए-पुश्त मसरूफ़ है
सामने बैठ कर अम्न की कर रहा है 'अदू गुफ़्तुगू
आसिम वास्ती
ग़ज़ल
न रहा धुआँ न है कोई बू लो अब आ गए वो सुराग़-जू
है हर इक निगाह गुरेज़-ख़ू पस-ए-इश्तिआ'ल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ये जो कहा कि पास-ए-इश्क़ हुस्न को कुछ तो चाहिए
दस्त-ए-करम ब-दोश-ए-ग़ैर यार ने रख दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
देख लेना पस-ए-क़ातिल भी कोई होगा ज़रूर
सिर्फ़ क़ातिल ही चलाता नहीं ख़ंजर देखो
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
मैं ने मंज़र ही नहीं देखे हैं पस-मंज़र भी
मुझ में अब जुरअत-ए-दीदार कहाँ से आई