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ग़ज़ल
अब तुझ से किस मुँह से कह दें सात समुंदर पार न जा
बीच की इक दीवार भी हम तो फाँद न पाए ढा न सके
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
किस नज़र-नाज़ ने उस बाज़ को बख़्शी पर्वाज़
सैंकड़ों मुर्ग़ हवा फाँद के पर बैठ गए
मीर शम्सुद्दीन फ़क़ीर
ग़ज़ल
मैं शहज़ादा हवा का हूँ ख़ला मेरी रियासत है
कभी मैं उड़ते उड़ते आसमाँ को फाँद जाता हूँ