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ग़ज़ल
किसी के ज़ख़्म पर अश्कों का फाहा रख दिया जाए
चलो सूरज के सर पर थोड़ा साया रख दिया जाए
रज़ा मौरान्वी
ग़ज़ल
ग़ैब से सहरा-नवरदों का मुदावा हो गया
दामन-ए-दश्त-ए-जुनूँ ज़ख़्मों का फाहा हो गया
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
मिरे ज़ख़्मों पे जो अश्कों का फाहा रख दिया तुम ने
मिरी जाँ हम भी इस को प्यार का मरहम समझते हैं
अख़्तर राँचवीं
ग़ज़ल
जो मेहर-ए-हश्र मिरे दाग़-ए-दिल का फाहा हो
रवा है अब्र का रूमाल चश्म-ए-तर के लिए