aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "phal"
पेड़ पर पक गया है फल शायदफिर से पत्थर उछालता है कोई
वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया थाउन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे
कुछ फल ज़रूर आएँगे रोटी के पेड़ मेंजिस दिन मिरा मुतालबा मंज़ूर हो गया
मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकलाक़ुरआ-ए-फ़ाल मिरे नाम का अक्सर निकला
फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिनइतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ
आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरेजितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे
मुसहफ़-ए-रुख़ है किसी का कि बयाज़-ए-हाफ़िज़ऐसे चेहरे से कभी फ़ाल निकाली जाए
मैं एक हिज्र-ए-बे-मुराद झेलता हूँ रात दिनजो ऐसे सब्र की तरह है जिस का फल नहीं रहा
आई थी मौज-ए-सब्ज़-ए-बाद-ए-शिमालयाद की शाख़ फल गई होगी
मुबारक फाल-ए-नेक ऐ ख़ुसरव-ए-शहरमुझे फ़रहाद फ़रमाया गया है
फ़रमान से पेड़ों पे कभी फल नहीं लगतेतलवार से मौसम कोई बदला नहीं जाता
हरीर अतलस-ओ-कमख़्वाब पंखुड़ी रेशमकिसी के फूल से तलवों से शाह-मात सभी
आँगन के मा'सूम शजर ने एक कहानी लिक्खी हैइतने फल शाख़ों पे नहीं थे जितने पत्थर बिखरे हैं
आती जाती हुई फ़स्लों का मुहाफ़िज़ हूँ मैंफल तो सब उस की अमानत हैं शजर मेरा है
बाग़ धुएँ में रहता है तोफल ज़हरीले हो जाते हैं
कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और सायामुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली
फल जाए मोहब्बत तो मोहब्बत है मोहब्बतऔर रास न आए तो मुसीबत है मोहब्बत
ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा
किन दरख़्तों से लगा रक्खी है उम्मीद-ए-समरशाख़ ही जब न हो सरसब्ज़ तो फल कैसे हो
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवारयूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है
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