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ग़ज़ल
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
कई लोगों ने फलते फूलते पेड़ों से जाना है
मगर मैं ने तुझे सब्ज़े की उर्यानी से पहचाना
कलीम हैदर शरर
ग़ज़ल
तुख़्म-रेज़ी कर रहा हूँ मैं इसी उम्मीद पर
फूलते फलते हुए कल ये शजर देखेंगे लोग
रम्ज़ अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मिसाल-ए-नख़्ल देखा है उसी को फूलते-फलते
किया जिस शख़्स ने हासिल तरीक़ा ख़ाकसारी का
मीर मेहदी मजरूह
ग़ज़ल
वाह क्या रंग है क्या ख़ूब तबीअत है 'रियाज़'
हो ज़मीं कोई तुम्हें फूलते-फलते देखा
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
सैल-ए-ग़म रखता है यूँ मेरे इरादों को जवाँ
जिस तरह सैलाब में फलते हैं पौदे धान के
हज़ीं लुधियानवी
ग़ज़ल
मिरी हस्ती मगर फ़स्ल-ए-बहार-ए-शो'ला है 'नाज़िम'
शरर फलते हैं दाग़ उगते हैं और अख़गर बरसते हैं