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ग़ज़ल
नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं
कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए
कुशल दौनेरिया
ग़ज़ल
इसराफ़ के जो हैं शैदाई शैतान के होते हैं भाई
पैसों का लुटाना आसाँ है पैसों का कमाना मुश्किल है
अतीक़ अहमद जाज़िब
ग़ज़ल
कभी देखा कि दिल कैसे सिकुड़ता है ज़रूरत पर
कभी दुनिया को पैसों की फ़रावानी से पहचाना
कलीम हैदर शरर
ग़ज़ल
हैं कुछ ऐसे लोग जो अपने पैसों से छपवाते हैं
औरों के काँधों पे चढ़ कर तस्वीरें अख़बारों में
फ़िरोज़ नातिक़ ख़ुसरो
ग़ज़ल
मैं ने रिश्तों से न बढ़ कर कभी पैसा समझा
तू ने पैसों से न बढ़ कर कभी रिश्ता समझा