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ग़ज़ल
कभी रहमतें थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता-ए-ज़मीं पर
वही ख़ित्ता-ए-ज़मीं है कि 'अज़ाब उतर रहे हैं
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
हर गोशा-ए-मग़रिब में हर ख़ित्ता-ए-मशरिक़ में
तशरीह दिगर-गूँ है अब तेरे पयामों की
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जाना नहीं कुछ जुज़ ग़ज़ल आ कर के जहाँ में
कल मेरे तसर्रुफ़ में यही क़ित'आ ज़मीं था
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
दीप जलते हैं दिलों में कि चिता जलती है
अब की दीवाली में देखेंगे कि क्या होता है