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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
वो गर्दिशें हैं कि छुट जाएँ ख़ुद ही बात से हात
ये ज़िंदगी हो तो क्या रब्त-ए-जाँ किसी से रहे
सहर अंसारी
ग़ज़ल
तो मिला जिस को उसे क्या जान ओ तन से वास्ता
तफ़रक़ा था जिस को रब्त-ए-जान-ओ-तन समझा था मैं
असर लखनवी
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
कि याद रख तू है शे'रों में ऐब रब्त-ए-कलाम
वो शे'र हों कि न हरगिज़ सुख़न सुख़न से मिले