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ग़ज़ल
लम्हा लम्हा उन की क़ुर्बत दिल में बसी है मेरे 'कमल'
तर्क-ए-त'अल्लुक़ आसाँ है ये कहना तो आसान लगे
कमल सीतापुरी
ग़ज़ल
भरोसा कीजिए किस की अता पर ऐ 'कमाल-अनवर'
ख़ुदा भी हम से वापस ज़िंदगानी माँग लेता है
अनवर कमाल अनवर
ग़ज़ल
मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ
वतन की ख़ाक ले कर एक मुट्ठी छोड़ देता हूँ