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ग़ज़ल
तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल
ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
लौह दिल को ग़म-ए-उल्फ़त को क़लम कहते हैं
कुन है अंदाज़-ए-रक़म हुस्न के अफ़्साने का
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
अल्लाह रे तिरा रो'ब कि अहवाल-ए-दिल अपना
दे देते हैं हम कर के रक़म कह नहीं सकते
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
आज हम कर चुके अहद-ए-तर्क-ए-सुख़न पर रक़म दस्तख़त
आज हम ने नए शाइ'रों के लिए भर्तियाँ खोल दें
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
तसव्वुर से लब-ए-लालीं के तेरे हम अगर रो दें
तो जो लख़्त-ए-जिगर आँखों से निकले इक रक़म निकले