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ग़ज़ल
ख़ुदा लगती कहो लिल्लाह सदाक़त को न झुटलाओ
तुम्हें अफ़्साना-ए-बेताबी-ए-'बिस्मिल' पसंद आया
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
कहाँ तक शिकवा-ए-बे-मेहरी-ए-अहबाब ऐ हमदम
ज़माना दरपए-आज़ार-ए-'बिस्मिल' होता जाता है
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
ज़िक्र-ए-'बिस्मिल' पे वो फ़रमाने लगे झुँझला कर
होगा कोई चलो जाने दो हमें याद नहीं
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
सितारों की ज़िया बन कर फ़रिश्तों का सलाम आया
ज़बान-ए-‘बिस्मिल’-ए-वारफ़्ता पर जब उन का नाम आया
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
मैं ने कब रोक के रक्खा तुम्हें जान-ए-'बिस्मिल'
ज़ेहन-ओ-दिल क्या है मिरी रूह में दाख़िल हो जाओ