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ग़ज़ल
कहाँ मेरे दिल की हसरत, कहाँ मेरी ना-रसाई
कहाँ तेरे गेसुओं का, तिरे दोश पर बिखरना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
ताकि मैं जानूँ कि है उस की रसाई वाँ तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हरीम-ए-नाज़ में उस की रसाई हो तो क्यूँकर हो
कि जो आसूदा ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार हो जाए
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
वो सर और ग़ैर के दर पर झुके तौबा मआज़-अल्लाह
कि जिस सर की रसाई तेरे संग-ए-आस्ताँ तक है
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
एक चीज़ जो अपनी रसाई से बाहर है कहीं 'ज़फ़र'
सच पूछो तो इस की हमें ज़रूरत बहुत ज़्यादा है