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ग़ज़ल
ये मेरे होने से और न होने से मुन्कशिफ़ है
कि रज़्म-ए-हस्ती में क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
आज से हम ने भी ज़ख़्मों को तबस्सुम जाना
रज़्म को बज़्म-गह-ए-लाला-एज़ाराँ समझे
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
अभी शिकस्त क्या कि रज़्म-ए-आख़िरी इक और है
पुकारती है ज़िंदगी हज़ीमतों के दरमियाँ
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
हम फ़क़ीरान-ए-मुहब्बत के अजब तेवर हैं
रज़्म-ए-का'बा भी बने बज़्म-ए-कलीसा भी हुए
सज्जाद बाक़र रिज़वी
ग़ज़ल
'रज़ा' वो रन पड़ा कल शब ब-रज़्म-ए-गाह-ए-जुनूँ
कुलाहें छोड़ के सब लोग सर बचाने लगे