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ग़ज़ल
ऐ शम्-ए-दिल-अफ़रोज़ शब-ए-तार-ए-मोहब्बत
बख़्शे है यही गर्मी-ए-बाज़ार-ए-मोहब्बत
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
फ़रिश्ते भी न समझे आज तक मेरी हक़ीक़त को
कि ताज-ए-अशरफ़-ए-मख़्लूक़ की ज़ीनत है सर मेरा