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ग़ज़ल
नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है
सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
दर-ओ-बसत-ए-जहाँ में देखते हैं सक़्म कुछ 'आली'
और अपनी सोच का इक नक़्शा-ए-इस्लाह रखते हैं
जलील ’आली’
ग़ज़ल
वो रिश्ता-ए-सर्व-ओ-समन ये मंसब-ए-दार-ओ-रसन
वो चश्म-ए-सुब्ह-ए-नाज़ थी ये दीदा-ए-शब-ताब है
मुईद रशीदी
ग़ज़ल
न हो मज़मून आली क्यूँ भला अशआ'र 'अहक़र' में
सुख़न-दानों से सोहबत है ज़बाँ-दानों में रहते हैं