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ग़ज़ल
किसी भी तरह रिश्वत दे के पक्की नौकरी कर लो
मियाँ ड्यूटी तुम्हें ले दे के सरकारी तो करनी है
तशना आज़मी
ग़ज़ल
अजल ने काम अपना कर दिया रिश्वत नहीं खाई
मैं काफ़ी देर तक चीख़ा कि पैसा ले के आया हूँ
इमरान साग़र
ग़ज़ल
क़ाज़ी ख़बर ले मय को भी लिक्खा है वाँ मुबाह
रिश्वत का है जवाज़ तिरी जिस किताब में
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
दर-गुज़रता जान तक करता ज़मीं उस से अज़ीज़
मुझ से दरबान-ए-दर-ए-जानाँ जो रिश्वत माँगता
आग़ा अकबराबादी
ग़ज़ल
झूट दग़ा, नफ़रत और रिश्वत ज़ेहनों के नीलाम हुए हैं
और तराज़ू में सोने के तुलते हैं ईमान न पूछ