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ग़ज़ल
ख़िज़ाँ की फ़स्ल में जो रिज़्क़-ए-वहशत-ए-शब था
लुटा रहा हूँ सर-ए-शब वही ख़ज़ीना-ए-ख़्वाब
शाहिद कमाल
ग़ज़ल
झूट ठहरा है 'मुनव्वर' उन रुतों के दरमियाँ
ख़्वाब-ए-इम्कान-ए-नुमू पैवंद-ए-जाँ देखा हुआ