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ग़ज़ल
क्या भला शैख़-जी थे दैर में थोड़े पत्थर
कि चले काबा के तुम देखने रोड़े पत्थर
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
खाइयाँ हैं खड्डे रोड़े हैं कंकर पत्थर हैं लेकिन
जन्नत के रस्ते लगते हैं सारे रस्ते गाँव के
इफ़्तिख़ार हैदर
ग़ज़ल
किसी से आस क्या रखना मुदावा क्यों करे कोई
जो हम ख़ुद आप अटकाते हैं वो रोड़े नहीं जाते
सुहैब फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ
वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है
जौन एलिया
ग़ज़ल
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया