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ग़ज़ल
आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ ख़ुश हैं 'फ़राज़'
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अनवर मिर्ज़ापुरी
ग़ज़ल
मिरी दास्ताँ मुझे ही मिरा दिल सुना के रोए
कभी रो के मुस्कुराए कभी मुस्कुरा के रोए
राजेन्द्र कृष्ण
ग़ज़ल
अल्लाह रे सोज़-ए-आतिश-ए-ग़म बा'द-ए-मर्ग भी
उठते हैं मेरी ख़ाक से शो'ले हवा के साथ