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ग़ज़ल
अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ ख़ुश हैं 'फ़राज़'
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़
गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
बे-रोए मिस्ल-ए-अब्र न निकला ग़ुबार-ए-दिल
कहते थे उन को बर्क़-ए-तबस्सुम हँसी से हम
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
अल्लाह-रे शाम-ए-ग़म मिरी बे-इख़्तियारियाँ
इक दिल है पास वो भी नहीं इख़्तियार में
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का आलम
तिरा हुस्न दस्त-ए-ईसा तिरी याद रू-ए-मर्यम