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ग़ज़ल
जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू
संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
संग-ए-असवद का है इक बुत संग-ए-मरमर का है एक
बरहमन ये तो बता किस बुत पे तुझ को नाज़ है
मोहम्मद उमर
ग़ज़ल
उफ़ रे सोज़-ए-दिल-ए-आशिक़ कि लहद पर उस के
संग-ए-मरमर सिफ़त-ए-बर्फ़ पिघलते देखा
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
चाल उस की मोरनी सी संग-ए-मरमर सा बदन
उस ने जब अंगड़ाइयाँ लीं रुत सुहानी हो गई