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ग़ज़ल
कौन ये नासेह को समझाए ब-तर्ज़-ए-दिल-नशीं
इश्क़ सादिक़ हो तो ग़म भी बे-मज़ा होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
वही साथी है जो रफ़ीक़ है वही यार है जो सदीक़ है
वही मेहर है वही मामता तुम्हें याद हो कि न याद हो
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
वो आतिश आज भी तेरा नशेमन फूँक सकती है
तलब सादिक़ न हो तेरी तो फिर क्या शिकवा-ए-साक़ी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
न वाजिब ही कहा जावे न सादिक़ मुमतना उस पर
किया तश्ख़ीस कुछ हम ने न हरगिज़ शख़्स-ए-इम्काँ को
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
किसी ख़ुर्शीद-रू को जज़्ब-ए-दिल ने आज खींचा है
कि नूर-ए-सुब्ह-ए-सादिक़ है ग़ुबार अपने बयाबाँ का
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
इश्क़ सादिक़ है तो अपने अज़्म-ए-मंज़िल की क़सम
हर क़दम पर साथ लाखों कारवाँ हो जाएँगे
दानिश अलीगढ़ी
ग़ज़ल
अपनी ही लाश पे हैं अश्क बहाए हुए लोग
हम हैं यक-तरफ़ा मोहब्बत के सताए हुए लोग