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ग़ज़ल
मैं उस महफ़िल को ठुकरा कर चला आया हूँ ऐ 'रहमत'
जहाँ महसूस की इख़्लास-ओ-उल्फ़त की कमी मैं ने
रहमत अमरोहवी
ग़ज़ल
ग़नीमत ये भी है इस दौर में फिर वर्ना ऐ हमदम
जनाब-ए-'बर्क़' साहब सा सुख़न-दाँ कौन देखेगा
रहमत इलाही बर्क़ आज़मी
ग़ज़ल
वो दोस्त सारे थे चार पल के जो चल दिए हम-सफ़र बदल के
'सहाब'-ए-नादाँ वहीं खड़ा है उसी डगर पर ठहर गया वो