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ग़ज़ल
हूर ओ ग़िल्माँ मिरी आँखों में समाएँ क्यूँ कर
किस में तेरी सी अदा तेरी सी रानाई है
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
बस में नहीं हूँ तो है फिर क्या हिजाब बाक़ी
कब तक भला ये रमज़ें दिल में समाएँ तेरी