aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "samar"
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहींकि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
जड़ उखड़ने से झुकाओ है मिरी शाख़ों मेंदूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे
झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखेंमगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी
एक फलदार पेड़ हूँ लेकिनवक़्त आने पे बे-समर भी हूँ
फिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर इक दूसरे के हम-सफ़र मैं और मिरी आवारगीना-आश्ना हर रह-गुज़र ना-मेहरबाँ हर इक नज़र जाएँ तो अब जाएँ किधर मैं और मिरी आवारगी
मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर उस ने कियाउम्र मेरी थी मगर उस को बसर उस ने किया
क्या शाख़-ए-बा-समर है जो तकता है फ़र्श कोनज़रें उठा 'शकेब' कभी सामने भी देख
मेहनत मिरी आँधी से तो मंसूब नहीं थीरहना था कोई रब्त शजर का भी समर से
हर बार है नया तिरे मिलने का ज़ाइक़ाऐसा समर किसी भी शजर ने नहीं दिया
बाग़-ए-जाँ से मिला न कोई समर'जौन' हम तो नुमू नुमू ठहरे
मुझे भी ना-रसाई का समर देमुझे तेरी तमन्ना जो रही थी
गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भीऐ ख़ाना-बर-अंदाज़-ए-चमन कुछ तो इधर भी
शजर हैं अब समर-आसार मेरेचले आते हैं दा'वेदार मेरे
झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँदशजर में पहले समर से कली निकलती है
मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा थामगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है
जानाँ दिल का शहर नगर अफ़्सोस का हैतेरा मेरा सारा सफ़र अफ़्सोस का है
कब तक इसे सींचोगे तमन्ना-ए-समर मेंये सब्र का पौदा तो न फूला न फला है
कोई आहट न कोई साया हैहर क़दम है सफ़र की तन्हाई
किन दरख़्तों से लगा रक्खी है उम्मीद-ए-समरशाख़ ही जब न हो सरसब्ज़ तो फल कैसे हो
हम पे कर ध्यान अरे चाँद को तकने वालेचाँद के पास तो मोहलत है सहर होने तक
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