हैराँ है जबीं आज किधर सज्दा रवा है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हैराँ है जबीं आज किधर सज्दा रवा है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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    रोचक तथ्य

    Faiz wrote this ghazal in October 1977, a few months after General Zia ul Haq overthrew Z. A. Bhutto (July 5, 1977)

    हैराँ है जबीं आज किधर सज्दा रवा है

    सर पर हैं ख़ुदावंद सर-ए-अर्श ख़ुदा है

    कब तक इसे सींचोगे तमन्ना-ए-समर में

    ये सब्र का पौदा तो फूला फला है

    मिलता है ख़िराज उस को तिरी नान-ए-जवीं से

    हर बादशह-ए-वक़्त तिरे दर का गदा है

    हर एक उक़ूबत से है तल्ख़ी में सवा-तर

    वो रंग जो ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा है

    एहसान लिए कितने मसीहा-नफ़सों के

    क्या कीजिए दिल का जला है बुझा है

    स्रोत :
    • पुस्तक : Nuskha Hai Wafa (पृष्ठ 583)

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