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ग़ज़ल
ख़ुश-लहनों के लिए गुलशन भी कुंज-ए-क़फ़स बन जाए तो
जब्र के गुन गाते हैं या नग़्मों में दर्द समोते हैं
अफ़ज़ल परवेज़
ग़ज़ल
मंजधार में ला कर नय्या भी माँझी को डुबोते देखा है
लम्हों के दरीदा दामन में बरसों को समोते देखा है
मुसर्रत जबीं ज़ेबा
ग़ज़ल
अहमद सलमान
ग़ज़ल
मुझ से लाग़र तिरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझ से नाज़ुक मिरी नज़रों में समाते भी नहीं